माता-पिता की गाइड
सदमा और उसके बादउन माता-पिता के लिए एक गर्मजोश, आसान गाइड जिनका बच्चा किसी डराने वाली घटना से गुज़रा है और तब से पहले जैसा नहीं रहा: वे शांत, स्थिर कदम जो बच्चे को फिर से सुरक्षित महसूस करने में मदद करते हैं।
अगर आपका बच्चा किसी डराने वाली घटना से गुज़रा है और तब से पहले जैसा नहीं रहा, तो यह आपका वहम नहीं है। डॉक्टर ऐसे बदलावों को किसी डराने वाली घटना पर होने वाली एक सामान्य प्रतिक्रिया मानते हैं।
शायद वह कोई सड़क हादसा था। शायद हिंसा, आग, बाढ़, या किसी क़रीबी की अचानक मौत। शायद किसी ने आपके बच्चे को चोट पहुँचाई। तब से आपका बच्चा बदला-बदला लगता है, और आपको समझ नहीं आता कि उस तक कैसे पहुँचें।
बच्चे डर को अपने ढंग से दिखाते हैं। बच्चे का शरीर और उसका बर्ताव अक्सर वह कह देते हैं जो उसके शब्द नहीं कह पाते। डॉक्टरों के लिए बनी गाइडेंस कुछ आम प्रतिक्रियाएँ बताती है।
यहाँ सच्ची उम्मीद है। जो बच्चे किसी डराने वाली घटना से गुज़रते हैं, उनमें से ज़्यादातर में लंबे समय तक चलने वाली तनाव की परेशानी नहीं बनती। यह किताब आपके बच्चे पर कोई लेबल नहीं लगाएगी। सिर्फ़ एक डॉक्टर ही बता सकते हैं कि आपके बच्चे को विशेषज्ञ की देखभाल की ज़रूरत है या नहीं। यह किताब आपको जो दिख रहा है उसे समझने में मदद करेगी, और ऐसे तरीकों से जवाब देने में जो सचमुच मदद करते हैं।
सुनीता का बेटा कबीर नौ साल का है। दो महीने पहले, उसे स्कूल ले जा रहे ऑटो-रिक्शा को एक कार ने टक्कर मार दी। किसी को गंभीर चोट नहीं आई। पर तब से कबीर एक भी रात पूरी नींद नहीं सोया। वह बुरे सपनों से जाग जाता है और माँ के बिस्तर में आ जाता है। वह स्कूल वैन में बैठने को तैयार नहीं होता। घर पर वह अपनी खिलौना गाड़ियों को बार-बार आपस में टकराता है। उसकी दादी कहती हैं कि वह बिगड़ रहा है और उसके साथ सख़्ती करनी चाहिए। सुनीता को इतना यक़ीन नहीं है।
उसका यह सोचना ठीक है। कबीर शरारत नहीं कर रहा। उसके बुरे सपने, वैन से उसका डर और गाड़ियाँ टकराने वाले उसके खेल, ये सब एक डरे हुए बच्चे की निशानियाँ हैं। जिस बात ने डराया, उसे खेल में बार-बार दोहराना बच्चों में एक आम प्रतिक्रिया है।
तीन दिन तक बस देखिए और लिखते जाइए। आपका बच्चा कब सबसे ज़्यादा परेशान होता है, और उससे ठीक पहले क्या हुआ था? वह कब शांत और सहज रहता है? आप अभी कुछ ठीक नहीं कर रहे। आप यह सीख रहे हैं कि डर किस बात से भड़कता है।
किसी डराने वाली घटना के बाद, बच्चे के अंदर का अलार्म चालू ही रह सकता है, जैसे ख़तरा अब भी यहीं हो। यह एक सामान्य प्रतिक्रिया है। यह न शरारत है, न कमज़ोरी, और न ग़लत परवरिश।
सोचिए कि आपके बच्चे के अंदर एक अलार्म है, जो उसे सुरक्षित रखने के लिए है। डराने वाले पल में यह ज़ोर से बजता है। ख़तरा टल जाने के बाद भी कुछ बच्चे ख़तरे के लिए चौकन्ने बने रहते हैं, जैसे अलार्म चालू ही अटक गया हो। इसलिए दरवाज़ा ज़ोर से बंद होने पर वे चौंक सकते हैं। ऊँची आवाज़ से डर लौट सकता है।
इसलिए जब ग़ुस्सा, चिपके रहना या बुरे सपने आएँ, तो पहले डर के बारे में सोचिए। ये डर की निशानियाँ हैं, बुरे बच्चे की नहीं। टोकने से पहले तसल्ली दीजिए।
यह आपकी ग़लती भी नहीं है। अगर किसी ने आपके बच्चे को चोट पहुँचाई है, तो दोष उसी इंसान का है जिसने यह किया। यह दोष न आपके बच्चे का है, और न आपका।
जिस दिन मैंने उसके नख़रों को डर की तरह देखा, बदतमीज़ी की तरह नहीं, उसी दिन मैंने उससे लड़ना छोड़ा और उसे सीने से लगाना शुरू किया।
सुनीता, 9 साल के कबीर की माँ
हमारे कई घरों में सलाह झट से मिलती है। इसके बारे में बात मत करो। बच्चे भूल जाते हैं। सख़्ती करो, वह ठीक हो जाएगा। इसमें से कुछ बातें प्यार से आती हैं। पर अकेली चुप्पी और सख़्ती एक डरे हुए बच्चे को उसके डर के साथ अकेला छोड़ सकती है।
हर बच्चे को तुरंत इलाज की ज़रूरत नहीं होती। पहले महीने में डॉक्टर ध्यान से नज़र रखने की सलाह दे सकते हैं, जिसमें उसी महीने के अंदर एक तय जाँच-मुलाक़ात हो। जो बच्चे लगातार जूझते रहते हैं, उन्हें विशेषज्ञ की मदद चाहिए। इस किताब का आख़िरी हिस्सा बताता है कि कब।
कुछ बच्चों को किसी दूसरे इंसान ने जान-बूझकर चोट पहुँचाई होती है, जैसे हिंसा या शोषण में। एक बड़ी समीक्षा में ऐसे बच्चों में लंबे समय तक चलने वाली तनाव की परेशानी का ख़तरा ज़्यादा था, और लड़कियों में भी। इसमें से कुछ भी आपके बच्चे के बारे में कोई फ़ैसला नहीं है। यह बस बताता है कि किस पर ज़्यादा ध्यान से नज़र रखनी है और किसे जल्दी मदद चाहिए।
अगली बार जब आपका बच्चा भड़क उठे या आपसे चिपक जाए, तो मन में कहिए: यह डर है, ज़िद नहीं। अपने कंधे ढीले छोड़िए। आपका शांत रहना एक अच्छा पहला कदम है।
घर पर अच्छी मदद आसान है। शांत रहिए, हर दिन को एक जैसा रखिए ताकि बच्चे को पहले से पता रहे, जब बच्चा बात करना चाहे तो सुनिए, और उसे वह घटना सुनाने के लिए कभी मजबूर मत कीजिए।
एक डरे हुए बच्चे को फिर से सुरक्षित महसूस करने की ज़रूरत होती है, बार-बार, छोटे-छोटे तरीकों से। आपको एक बड़ी बातचीत की ज़रूरत नहीं। आपको कई आम पल चाहिए जो कहें: अब तुम सुरक्षित हो, और मैं यहाँ हूँ। सुरक्षा का एहसास बार-बार दिलाइए, छोटे, रोज़मर्रा के तरीकों से।
अपने शब्द छोटे, सच्चे और शांत रखिए। आप कह सकते हैं, "वह बहुत डराने वाला था। अब तुम सुरक्षित हो। मैं यहाँ हूँ।" या, "ऐसी किसी बात के बाद बहुत से बच्चे ज़रा-ज़रा सी बात पर चौंकने लगते हैं। हम मिलकर इससे निकल जाएँगे।" अगर आपका बच्चा सवाल पूछे, तो उसकी समझ के हिसाब से आसान और सच्चे जवाब दीजिए।
उतना ही ज़रूरी है यह जानना कि क्या नहीं करना है। अपने बच्चे से वह घटना बार-बार मत सुनवाइए, न अपने सामने, न रिश्तेदारों के सामने। जो डॉक्टर शोषण झेल चुके बच्चों की देखभाल करते हैं, उनसे कहा जाता है कि बच्चे से वह बात जितनी कम बार हो सके, उतनी ही बार दोहरवाएँ, क्योंकि इससे बच्चे को फिर से चोट पहुँच सकती है। बारीकियों के लिए ज़ोर मत डालिए, और जो हुआ उसके बारे में सवालों की झड़ी मत लगाइए। पहल उसे करने दीजिए। कुछ बच्चे ड्रॉइंग, लिखने या खिलौनों के ज़रिए दिखाते हैं कि क्या हुआ, और यह ठीक है।
एक और कदम मदद कर सकता है: रोज़ का ढर्रा। कोशिश कीजिए कि खाना, स्कूल, खेल और सोने का वक़्त नियमित रहे, ताकि हर दिन जाना-पहचाना लगे। किसी भी बदलाव से पहले थोड़ा पहले बता दीजिए। विदा छोटी और प्यार भरी रखिए, और जब लौटने को कहा हो, तब ज़रूर लौटिए।
क्लास टीचर को थोड़े में बता दीजिए कि आपका बच्चा किसी कठिन दौर से गुज़रा है। आपको बारीकियाँ बताने की ज़रूरत नहीं। टीचर से कहिए कि मूड, दिन में ऊँघने या नंबरों में कोई बदलाव दिखे तो आपको बताएँ। अपने बच्चे को धीरे-धीरे स्कूल के आम दिन में वापस लौटने में मदद कीजिए। अगर कुछ हफ़्तों बाद भी आपका बच्चा स्कूल बिलकुल नहीं संभाल पा रहा, तो यह डॉक्टर से बात करने का इशारा है।
याद रखिए
आपके बच्चे को आपसे एकदम सही शब्दों की ज़रूरत नहीं है। उसे आपका शांत चेहरा, आपकी स्थिर आवाज़, और कल जैसा ही सोने का वक़्त चाहिए। छोटा और स्थिर काफ़ी है।
दिन का कोई एक हिस्सा चुनिए जो मुश्किल हो गया है, मान लीजिए सोने का वक़्त। इस हफ़्ते उसे हर रात एक जैसा रखिए: वही समय, वही कदम, वही गुडनाइट वाले शब्द। फिर देखिए कि क्या वह थोड़ा आसान होता है।
अगर नुकसान किसी इंसान से हुआ है, तो पहला काम है अपने बच्चे को उससे सुरक्षित रखना। बिना फ़ैसला सुनाए सुनिए, उसे बताइए कि यह उसकी ग़लती नहीं है, और उन लोगों से मदद लीजिए जिन्हें बच्चों की हिफ़ाज़त की ट्रेनिंग मिली है।
कुछ बच्चों को कोई दूसरा इंसान चोट पहुँचाता है। वह कोई अजनबी हो सकता है, या कोई ऐसा जिसे परिवार जानता है और जिस पर भरोसा करता है। इससे यक़ीन करना मुश्किल हो सकता है, और कुछ करना भी। अगर आपका बच्चा आपको बताए कि किसी ने उसे चोट पहुँचाई है, तो इसे गंभीरता से लीजिए, और उसे उस इंसान से दूर रखिए।
अपने बच्चे के सामने शांत रहिए, चाहे अंदर से आप सदमे या ग़ुस्से से भरे हों। आप कह सकते हैं, "मुझे बताने के लिए शुक्रिया। तुमने सही किया। यह तुम्हारी ग़लती नहीं है। तुम्हारी हिफ़ाज़त मेरी ज़िम्मेदारी है।" हर बारीकी मत पूछिए। ट्रेनिंग पाए लोग जो पूछना ज़रूरी होगा, सही तरीके से पूछेंगे। उन्हें आपको यह भी बताना चाहिए कि आने वाले हफ़्तों में किन बदलावों पर नज़र रखनी है, और कब और मदद लेनी है।
रेखा की बेटी अंजलि बारह साल की है। एक शाम अंजलि ने अपनी माँ को बताया कि जब बड़े आस-पास नहीं होते थे, तब एक रिश्तेदार के हाथों उसे चोट पहुँच रही थी। रेखा का पहला ख़याल था कि यह सच नहीं हो सकता। परिवार के कुछ बड़ों ने कहा कि परिवार की इज़्ज़त के लिए इसे दबा दो। रेखा ने अपनी बेटी पर यक़ीन करना चुना। उसने उस रिश्तेदार को घर से दूर रखा। फिर उसने चाइल्ड हेल्पलाइन, 1098, पर फ़ोन किया, और वहाँ के लोगों ने आगे के कदमों में उसे रास्ता दिखाया।
क़ानून क्या कहता है, आसान शब्दों में यह है। भारत में POCSO क़ानून 18 साल से कम उम्र के बच्चों को यौन शोषण से बचाता है। जिस किसी को भी पता हो कि किसी बच्चे का यौन शोषण हुआ है, या जिसे डर हो कि ऐसा होने की आशंका है, उसे पुलिस को बताना ही होगा। यह एक ज़िम्मेदारी है, कोई एहसान नहीं, और यह हर किसी पर लागू होती है, डॉक्टरों, टीचरों और परिवार पर भी। जो इंसान ईमानदारी से पुलिस को बताता है, उस पर ऐसा करने के लिए न मुक़दमा किया जा सकता है, न कोई आरोप लगाया जा सकता है। क़ानून बच्चे की निजता की भी रक्षा करता है: मीडिया बच्चे का नाम या उससे जुड़ी जानकारी नहीं छाप सकता, और पुलिस और अदालत को बच्चे की पहचान सुरक्षित रखनी ही होगी।
चाइल्ड हेल्पलाइन, 1098, मुफ़्त है और दिन-रात खुली रहती है, मुश्किल हालात में फँसे किसी भी बच्चे के लिए। इमरजेंसी में आप 112 पर भी फ़ोन कर सकते हैं। यह हेल्पलाइन बच्चे को इलाज, रहने की सुरक्षित जगह, क़ानूनी मदद और मन के सहारे से जोड़ सकती है। यह किताब क़ानूनी सलाह नहीं दे सकती। हेल्पलाइन, पुलिस या कोई वकील हर कदम समझा सकते हैं।
बहुत से परिवार इस बात से डरते हैं कि लोग क्या बातें बनाएँगे। लोग क्या कहेंगे। चुप रहना परिवार को बचाने जैसा लग सकता है। पर चुप्पी आपके बच्चे को बिना हिफ़ाज़त के छोड़ सकती है। बोलना ही वह तरीका है जिससे आप अपने बच्चे की हिफ़ाज़त करते हैं। इससे आपके बच्चे को यह भी पता चलता है कि आप उसकी तरफ़ हैं।
आज ही 1098 अपने फ़ोन में सेव कर लीजिए, अपने बच्चे के डॉक्टर के नंबर के पास। अगर कभी ज़रूरत पड़े, तो घबराहट में आपको इसे ढूँढना नहीं पड़ेगा।
जब आपके बच्चे को चोट पहुँचती है, तो चोट आपको भी पहुँचती है। आपका सदमा, अपराध-बोध और डर असली हैं, और हो सकता है आपको भी अपने लिए सहारे की ज़रूरत हो। अपना ख़्याल रखना स्वार्थ नहीं है। यह आपके बच्चे की मदद का ही हिस्सा है।
बच्चे के साथ हुई किसी डराने वाली घटना के बाद माता-पिता की अपनी भी प्रतिक्रियाएँ हो सकती हैं। हो सकता है आप रात में उसे बार-बार मन में दोहराएँ। आप ख़ुद को ज़रा-ज़रा सी बात पर चौंकता हुआ, ग़ुस्से में या सुन्न महसूस कर सकते हैं। हो सकता है आप ख़ुद भी वहाँ रहे हों, उसी हादसे में या उसी बाढ़ में। आपकी अपनी देखभाल आपके बच्चे की देखभाल का हिस्सा है।
आपको अपराध-बोध हो सकता है, ख़ासकर शोषण के बाद। मैंने यह क्यों नहीं देखा? मैंने उस इंसान पर भरोसा क्यों किया? यह बात साफ़-साफ़ सुन लीजिए। यह आपकी वजह से नहीं हुआ। आप इसे मिटा नहीं सकते। पर आप मदद कर सकते हैं।
संयुक्त परिवार में दबाव बढ़ता जा सकता है। एक रिश्तेदार कहता है भूल जाओ। दूसरा आपको दोष देता है। तीसरा चाहता है कि सब दबा दिया जाए। आपको हर बहस नहीं जीतनी है। एक छोटी, स्थिर बात काम आती है: "हम डॉक्टर की सलाह पर चल रहे हैं, और हम उसे सुरक्षित रख रहे हैं।"
एक ऐसा इंसान ढूँढिए जो आपके साथ हो: आपका जीवनसाथी, बहन, कोई दोस्त, कोई काउंसलर। मुश्किल बात किसी ऐसे के सामने ज़ोर से कहिए जो फ़ैसला न सुनाए। अगर हफ़्तों तक आपकी अपनी नींद, मूड या ग़ुस्सा बुरी तरह हिले रहें, तो अपने लिए भी डॉक्टर से मिलिए। आपकी मदद आपके बच्चे की मदद है।
आपके साथ
उन रातों में जब आप जागते हुए सब कुछ बार-बार सोचते रहते हैं, यह सुन लीजिए: जो माता या पिता अपने बच्चे की मदद के लिए पूरी किताब पढ़ रहे हैं, वे नाकाम नहीं हो रहे। आप अपने बच्चे और डर के बीच खड़े हैं। एक माता या पिता की जगह ठीक वहीं है।
आज रात अपने शरीर के लिए एक छोटा काम कीजिए: धीमी सैर, जल्दी सो जाना, या शांति में एक कप चाय। कल भी यही कीजिए। ज़्यादा संभले हुए आप भी आपके बच्चे के ठीक होने का हिस्सा हैं।
अगर बदलाव लगभग एक महीने से ज़्यादा चलें, तो डॉक्टर से मिलने का वक़्त है। अगर हालात बिगड़ रहे हों, तो और जल्दी जाइए। इलाज की गाइडलाइंस जिस मुख्य इलाज की सलाह देती हैं, वह सदमे पर केंद्रित एक बातचीत वाली थेरेपी है।
पहले कुछ हफ़्तों में देखते रहिए कि चीज़ें कैसी चल रही हैं। फिर अगर इनमें से कोई भी बात सच हो, तो डॉक्टर से मिलिए।
7 से 17 साल के जो बच्चे लगातार जूझते रहते हैं, उनके लिए गाइडलाइंस एक बातचीत वाली थेरेपी की सलाह देती हैं, जिसे trauma-focused CBT (सदमे पर केंद्रित CBT) कहते हैं। 5 और 6 साल के बच्चों के लिए वे कहती हैं कि इस पर विचार किया जाए। एक ट्रेनिंग पाए थेरेपिस्ट आपके बच्चे को डर की प्रतिक्रियाओं के बारे में, और शरीर को शांत करने के तरीकों के बारे में सिखाते हैं। फिर थेरेपिस्ट आपके बच्चे को उस याद से धीरे-धीरे गुज़रने में, और याद दिलाने वाली चीज़ों से कतराना छोड़ने में मदद करते हैं। जहाँ बच्चे के लिए ठीक हो, वहाँ माता-पिता भी हिस्सा लेते हैं। थेरेपी को आपके बच्चे की उम्र और उसके विकास के पड़ाव के हिसाब से ढाला जाता है।
और दवा का क्या? बच्चों और किशोरों में, सदमे के बाद की इन प्रतिक्रियाओं के लिए दवा आम इलाज नहीं है। पहले बातचीत वाली थेरेपी आती है। अगर आपके बच्चे का मन भी बहुत ज़्यादा उदास रहता हो या कोई और परेशानी हो, तो डॉक्टर आपके साथ मिलकर विकल्पों को ध्यान से तौलेंगे।
याद रखिए
एक अच्छे डॉक्टर या थेरेपिस्ट पूरे बच्चे को देखते हैं: नींद, स्कूल, दोस्त, मन का हाल और परिवार। वे आपके बच्चे को तैयार होने से पहले उस घटना को फिर से जीने पर मजबूर नहीं करेंगे। हर फ़ैसले में आप शामिल रहते हैं।
पहली मुलाक़ात से पहले आपके पास हर जवाब होना ज़रूरी नहीं। आपने जो देखा है, वही लेकर जाइए: डर कब सबसे ज़्यादा होता है, उसे क्या भड़काता है, और किस चीज़ से थोड़ी मदद होती है। 7 से 17 साल के कुछ बच्चों के लिए डॉक्टर एक और थेरेपी पर विचार कर सकते हैं, जिसे EMDR कहते हैं। ऐसा सिर्फ़ तब होता है जब घटना को 3 महीने से ज़्यादा हो चुके हों, और trauma-focused CBT से मदद न मिली हो या आपका बच्चा उसमें हिस्सा न ले पाया हो। जल्दी मदद माँगना ज़रूरत से ज़्यादा घबराना नहीं है। यह अच्छी परवरिश है।
कुछ निशानियों का मतलब है अभी कदम उठाना, बाद में नहीं। यहाँ अपने मन की आवाज़ पर भरोसा कीजिए। ऐसी मदद ले लेना बेहतर है जिसकी शायद पूरी ज़रूरत न थी, बजाय किसी ऐसे पल को चूक जाने के जो मायने रखता था।
मरने या ख़ुद को चोट पहुँचाने की बात।
जीना न चाहने की, या ख़ुद को चोट पहुँचाने की कोई भी बात हो, तो उसी दिन मदद चाहिए।
अभी सुरक्षित नहीं।
अगर चोट पहुँचाने वाला इंसान अब भी आपके बच्चे तक पहुँच सकता है, तो उसे दूर रखने के लिए अभी कदम उठाइए।
न खाना, न नींद।
कई दिनों तक खाना, पानी या नींद न हो, तो जल्दी डॉक्टर चाहिए।
बात उस तक नहीं पहुँचती।
अगर आपका बच्चा याद में खोया-सा लगे और कोई चीज़ उसे शांत न कर पाए, तो मदद लीजिए।
अगर आपको लगे कि आपका बच्चा अभी इसी वक़्त ख़तरे में है, तो इंतज़ार मत कीजिए। 112 पर फ़ोन कीजिए, या सबसे पास के अस्पताल की इमरजेंसी में जाइए। उसके साथ रहिए, और ऐसी चीज़ों तक उसकी पहुँच कम कीजिए जिनसे वह ख़ुद को चोट पहुँचा सकता है। Tele-MANAS, 14416, मन की सेहत के लिए सरकार की मुफ़्त हेल्पलाइन है, जो दिन-रात खुली रहती है। अगर आपको चिंता है, तो अपने बच्चे से नरमी से और सीधे पूछिए कि क्या उसके मन में ख़ुद को चोट पहुँचाने के ख़याल आते हैं। किशोरों और बड़ों पर हुए अध्ययनों की एक समीक्षा में, आत्महत्या के ख़यालों के बारे में पूछने से वे ख़याल बढ़े नहीं। मदद मौजूद है, और आपको इसका सामना अकेले नहीं करना है।
जो बच्चा आज डरा हुआ है, वह एक स्थिर माता-पिता और सही मदद के साथ, दुनिया में फिर से सुरक्षित महसूस कर सकता है।
वे दो या तीन बदलाव लिखिए जो आपको सबसे ज़्यादा चिंता में डालते हैं, हर एक के साथ एक सच्चा उदाहरण। यह लिस्ट अपने फ़ोन में रखिए, 1098 और Tele-MANAS, 14416, के पास। इसके तैयार होने से पहला फ़ोन, और पहली मुलाक़ात, कहीं आसान हो जाते हैं।
यह जानकारी कहाँ से है
यह गाइड समझने में मदद करती है। यह निदान नहीं है। उसके लिए डॉक्टर से मिलें।