भाई-बहन की गाइड
न्यूरोडाइवर्जेंसADHD वाले किसी अपने के भाई या बहन के लिए एक गर्मजोश, आसान भाषा वाली गाइड: घर उस तरफ़ क्यों झुका, वह बोझ जो आपने चुपचाप उठाया था, और ख़ुद को खोए बिना उनके साथ कैसे खड़े रहें।
अगर आप एक ऐसे भाई या बहन के साथ बड़े हुए जिसे ज़्यादा चाहिए था, और आप शांत रहने वाले बन गए, मदद करने वाले, वह जो और शोर नहीं बढ़ाता, तो यह किताबचा आपके लिए है। इसमें से कुछ भी आपका वहम नहीं था।
हो सकता है आपका भाई खाने की मेज़ पर टिककर बैठ ही न पाता हो। हो सकता है आपकी बहन किताबें भूल जाती हो, आपा खो देती हो, होमवर्क पर पूरी तरह बिखर जाती हो, और पूरा घर उसी के इर्द-गिर्द झुक जाता हो। आपने बहुत जल्दी घर का मौसम पढ़ना सीख लिया। आपने चुप हो जाना सीखा, मदद करना सीखा, और एक और मुश्किल न बनना सीखा।
ADHD वाले भाई या बहन के साथ बड़ा होना आपके दिनों और आपकी भावनाओं पर सच्चा असर डालता है। बहुत से भाई-बहन आख़िर में मदद का ज़्यादा काम उठा लेते हैं, माता-पिता का ज़्यादा वक़्त और ध्यान दूसरे बच्चे की तरफ़ जाते देखते हैं, और इस सब को लेकर भावनाओं की एक उलझन साथ लिए चलते हैं। आप कुछ गढ़ नहीं रहे थे, और आप नाटक भी नहीं कर रहे थे।
बहुत से भाई-बहनों के लिए यह भूमिका बिना किसी के तय किए आ जाती है। आप बस वह हैं जो इंतज़ार कर सकता है, इसलिए आप इंतज़ार करते हैं। आप वह हैं जो संभल जाता है, इसलिए संभलना आपका काम बन जाता है। सालों में, आसान होना कुछ ऐसा नहीं रह जाता जो आप महसूस करते हैं। वह कुछ ऐसा बन जाता है जो आप निभाते हैं।
मैं आसान वाली थी। सालों लग गए यह समझने में कि आसान होने का मतलब बस इतना था कि मैं कुछ माँगती ही नहीं थी।
काव्या, 17 साल
एक आम-सी चीज़ सोचिए जो आपने घर की शांति बनाए रखने के लिए छोटी उम्र में करनी शुरू की थी: चुप रहना, मदद करना, ज़्यादा कुछ न माँगना। उसे ख़ुद के लिए एक नाम दीजिए। आपको आज ही उसे ठीक नहीं करना है। बस इतना देख लीजिए कि आपने उसे उठाया था।
आपके भाई-बहन का सबसे मुश्किल बर्ताव इस बात से आता है कि उनका दिमाग ध्यान और ख़ुद पर काबू को कैसे संभालता है। यह एक स्थिति का हिस्सा है, न उनकी शरारत, और न इस बात की निशानी कि आपके माता-पिता उन्हें आपसे ज़्यादा प्यार करते हैं।
अब वह बात, जिससे यह सब कुछ अलग महसूस होने लगता है। जब आपका भाई-बहन सुनता नहीं, बीच में बोल पड़ता है, मन में आते ही कर बैठता है, या टिककर बैठ नहीं पाता, तो यह इस बात से आता है कि उनका दिमाग किस तरह बनता है और ध्यान को कैसे संभालता है। ADHD सेहत से जुड़ी एक मानी हुई स्थिति है। यह बर्ताव एक लक्षण है, कोई चुनाव नहीं, और यह भी नहीं कि वे घर के चहेते हैं।
इसलिए जब आपके माता-पिता ने उन्हें ज़्यादा वक़्त दिया, ज़्यादा बार याद दिलाया, ज़्यादा नज़र रखी, तो अक्सर वे एक बड़ी ज़रूरत का जवाब दे रहे थे, आपसे कम प्यार नहीं कर रहे थे। फिर भी, जहाँ आप खड़े थे वहाँ से यह गहरी नाइंसाफ़ी लग सकती थी। दोनों बातें एक ही साथ सच हैं।
काव्या सत्रह साल की है। उसका भाई देव ग्यारह साल का है और उसे ADHD है। सालों तक उसे लगता रहा कि उसके माता-पिता बस देव को ज़्यादा चाहते हैं। होमवर्क में मदद उसे मिलती, सब्र उसे मिलता, दूसरा और तीसरा मौका उसे मिलता। काव्या को मिलता, "तुम बड़ी हो, तुम समझती हो।" उसे यह देखने में बहुत वक़्त लगा कि देव को कोई आसान ज़िंदगी नहीं थमाई जा रही थी। वह सचमुच किसी चीज़ से जूझ रहा था, और वह ज़्यादा ध्यान असल में परिवार की उसके साथ चलते रहने की कोशिश थी।
इसका यह मतलब नहीं कि हर नाइंसाफ़ी असल में इंसाफ़ ही थी। माता-पिता भी थक जाते हैं और खिंच जाते हैं, और कभी-कभी तराज़ू सचमुच बहुत देर तक बहुत ज़्यादा एक तरफ़ झुका रह जाता है। यह समझ लेना कि ऐसा क्यों हुआ, यह कहने जैसा नहीं है कि इसकी आपको कोई क़ीमत नहीं चुकानी पड़ी। आप दोनों बातें एक साथ रख सकते हैं: यह आप पर तानी गई कोई सज़ा नहीं थी, और फिर भी उस बच्चे का होना मुश्किल था जिसे कम चाहिए था।
अगली बार जब वही पुराना ख़याल आए, "वे हमेशा उसे ज़्यादा चाहते थे", तो उसकी जगह यह रखकर देखिए: "उसे ज़्यादा मदद चाहिए थी, और यह ज़्यादा प्यार जैसा नहीं है।" ग़ौर कीजिए कि क्या आपके सीने की जकड़न थोड़ी-सी भी ढीली पड़ती है।
मदद करना, माहौल शांत करना, उम्र से थोड़ा पहले बड़ा हो जाना: ये सच्चे बोझ हैं। नाराज़गी महसूस करना, और फिर उस नाराज़गी पर अपराधबोध महसूस करना, यह भी उतना ही सच्चा बोझ है। यह सब आम है।
जब किसी भाई-बहन को बहुत कुछ चाहिए होता है, तो उसके पास वाला भाई या बहन अक्सर चुपचाप वे काम उठा लेता है जो असल में बड़ों के उठाने के हैं। आप एक तरह के दूसरे माता-पिता बन गए होंगे, शांति बनाए रखने वाले, अपने भाई-बहन और बाक़ी घर के बीच बात पहुँचाने वाले। इस जगह पर खड़े बहुत से भाई-बहन एक मुश्किल मिलावट महसूस करते हैं: तनाव, चिंता, कभी-कभी नाराज़गी, और फिर किसी जूझते इंसान से नाराज़ होने पर अपराधबोध।
वह अपराधबोध ही सबसे बेरहम हिस्सा है। आप उनसे प्यार करते हैं। और आप थक भी गए, या जलन भी हुई, या ग़ुस्सा भी आया कि आपकी अपनी चीज़ें लगातार छोटी होती जा रही थीं। प्यार और नाराज़गी, दोनों महसूस करना आपको बुरा भाई-बहन नहीं बनाता। यह आपको एक सच्चा भाई-बहन बनाता है।
बहुत से भारतीय घरों में यह बोझ लगभग दिखता ही नहीं, क्योंकि यह अच्छा होने जैसा लगता है। ज़िम्मेदार बड़ी बहन, समझदार छोटा भाई, वह बच्चा जो कभी शिकायत नहीं करता। रिश्तेदार इसकी तारीफ़ करते हैं। कोई नहीं पूछता कि इसकी क़ीमत क्या है। छोटी उम्र में समझदार कहलाना कभी-कभी बस उस बोझ की तारीफ़ होती है जो आपको उठाना ही नहीं चाहिए था।
इसका एक दूसरा पहलू भी है जिसे नाम देना ठीक रहेगा। कुछ भाई-बहन इससे सच्ची ताक़तें भी पाते हैं: सब्र, दूसरों का दर्द समझना, कमरे का मौसम पढ़ लेना, एक ऐसा ठहराव जिस पर दोस्त भरोसा करने लगते हैं। यह सच हो सकता है, और फिर भी बोझ बहुत भारी रहा हो सकता है। आपने जो सीखा उसकी क़दर कर सकते हैं, बिना यह दिखाए कि वह मुफ़्त में मिला था।
ऊपर दिए चार बोझों को देखिए। जो सबसे ज़्यादा आपके जैसा लगे, उस पर निशान लगाइए। फिर बस ख़ुद से कहिए: एक बच्चे के लिए यह बहुत ज़्यादा था। इसे मान लेने से आप शिकायत नहीं कर रहे।
आप अपने भाई-बहन से प्यार भी कर सकते हैं और उनका साथ भी दे सकते हैं, बिना उनके तीसरे माता-पिता बने। आपका काम उनका भाई या बहन होना है। इलाज करना और सब संभालना बड़ों का काम है।
कभी-कभी मदद करने और किसी की ज़िम्मेदारी उठा लेने में सच्चा फ़र्क़ है। मदद यह है कि बहन बस्ता भूल जाए तो आप उसे थमा दें। ज़िम्मेदारी यह लगने लगना है कि उसका पूरा दिन आपको ही ठीक करना है। आप भाई-बहन हैं, माता-पिता नहीं, और उस हद का होना जायज़ है।
आपके भाई-बहन के लिए जो सचमुच काम आता है, वह अक्सर आपकी सोच से छोटा और ज़्यादा गर्मजोशी वाला होता है। एक ऐसा इंसान होना जो उन्हें हर वक़्त टोकता नहीं। वे जिसमें अच्छे हैं, उसे खुलकर कह देना। एक ऐसे घर में सुरक्षित इंसान होना जो अक्सर एक लंबी हिदायत जैसा लगता है। भाई-बहन बेहतर रहते हैं, और ADHD वाले बच्चे भी, जब परिवार भाई या बहन को सुने जाने लायक़ इंसान की तरह देखता है, न कि एक और देखभाल करने वाले की तरह।
इसका यह भी मतलब है कि आप ना कह सकते हैं। जो काम बहुत बड़ा है, उससे आप पीछे हट सकते हैं। आप किसी माता या पिता से कह सकते हैं, "मुझे देव से प्यार है, पर उसके होमवर्क की ज़िम्मेदारी मुझसे नहीं उठेगी।" वह लकीर खींचना अपने भाई-बहन को छोड़ जाना नहीं है। यह ज़िम्मेदारी को वापस वहीं रख देता है जहाँ वह है, बड़ों के पास और डॉक्टर के पास।
याद रखिए
आपके भाई-बहन का ADHD आपने पैदा नहीं किया, और आप उसे ठीक भी नहीं कर सकते। उनसे प्यार करना आपका हिस्सा है। उसका इलाज करना नहीं। आप सबसे ज़्यादा काम की जो चीज़ हो सकते हैं, वह है एक ठहरा हुआ भाई या बहन, न कि एक बिना पैसे, बिना सीख, थका-हारा देखभाल करने वाला।
एक चीज़ सोचिए जो आप अभी अपने भाई-बहन के लिए करते हैं और जो असल में किसी बड़े का काम है। बस एक। कल्पना कीजिए कि इस हफ़्ते आप उसे नरमी से किसी माता या पिता को वापस थमा रहे हैं। अभी करना ज़रूरी नहीं है। बस ग़ौर कीजिए कि यह ख़याल कैसा लगता है।
यह घर आपने चुना नहीं था, और सिर्फ़ इसलिए कि किसी और की ज़रूरतें ज़्यादा ऊँची आवाज़ में थीं, आपकी ज़रूरतें मायने रखना बंद नहीं हो गईं। अपना ख़याल रखना स्वार्थ नहीं है। यह तो पहले ही हो जाना चाहिए था।
कहीं रास्ते में आपने तय कर लिया होगा कि आपका काम कुछ भी न चाहना है। ठीक रहना। वह आसान वाला बनना ताकि बड़ों के सिर पर एक चीज़ कम रहे। उस वक़्त उस फ़ैसले का मतलब था। यह जीने का एक भारी तरीका भी है, और यही एक वजह है कि ADHD वाले बच्चों के भाई-बहन चुपचाप उससे ज़्यादा चिंता और उदास मन उठा सकते हैं जितना किसी को दिखता है।
आपकी भावनाएँ सीधे ध्यान की हक़दार हैं, इसलिए नहीं कि आपमें कुछ गड़बड़ है, बल्कि इसलिए कि आप भी इस परिवार के एक इंसान हैं। अपने लिए वक़्त, ध्यान और देखभाल चाहना अपने भाई-बहन से कुछ छीनना नहीं है।
संयुक्त परिवार में, जहाँ सब देख रहे होते हैं और तुलना कर रहे होते हैं, कुछ भी माँगना नाशुक्रा लगे बिना नामुमकिन लग सकता है। आप नाशुक्रे नहीं हैं। आप एक नौजवान हैं जिसे सालों तक, नरमी से, इंतज़ार करने को कहा गया। अब इंतज़ार करना बंद कर देना जायज़ है।
अपना ख़याल रखना छोटा और आम-सा हो सकता है। एक दोस्त जो असली कहानी जानता हो। एक बड़ा इंसान, कोई टीचर, कोई चाची या मौसी, कोई कज़िन, जो सचमुच सुनता हो। कोई एक चीज़ जो सिर्फ़ आपकी हो, जिसे घर संभालने न आए। आराम पाने के लिए पहले काम का साबित होना ज़रूरी नहीं है। जो देखभाल आप लगातार बाँटते रहते हैं, उसमें से कुछ अपनी तरफ़ मोड़ लेना आपका हक़ है।
मैं इंतज़ार करती रही कि कोई पूछे कि मैं ठीक हूँ या नहीं। आख़िर में मुझे ख़ुद ही पूछने वाली बनना सीखना पड़ा।
काव्या, 17 साल
एक चीज़ को नाम दीजिए जो आपको चाहिए और जिसके बिना आप चुपचाप चलते आ रहे हैं: आराम, अकेले का वक़्त, कोई जिससे बात हो सके, कोई शौक़ जो सिर्फ़ आपका हो। एक चुनिए। इस हफ़्ते किसी एक भरोसेमंद इंसान को उसके बारे में बताइए। यह स्वार्थ नहीं है। यह आप हैं, आख़िरकार अपनी ही लिस्ट में।
आपके भाई-बहन की देखभाल डॉक्टर का और आपके माता-पिता का काम है, कोई ऐसा वज़न नहीं जिसे आप अकेले उठाएँ। परिवार के तौर पर खुलकर बात करना सबका दबाव कम करता है, आपका भी।
आपके भाई-बहन की स्थिति अकेले आपको संभालनी थी ही नहीं। ADHD ऐसी चीज़ है जिसे डॉक्टर, माता-पिता और स्कूल मिलकर संभालते हैं, एक सच्ची योजना के साथ। जब पूरा परिवार समझ लेता है कि हो क्या रहा है और उस पर ईमानदारी से बात करता है, तो सबके लिए चीज़ें आसान होती हैं, ADHD वाले बच्चे के लिए भी और उसके पास वाले भाई या बहन के लिए भी।
उस ईमानदारी में आप भी शामिल हैं। आप साफ़ और अपनी उम्र के हिसाब से जवाब पाने के हक़दार हैं: ADHD है क्या, आपका भाई-बहन ऐसा क्यों करता है, और योजना क्या है। आप वह इंसान हैं जिसे बताया जाना चाहिए और जिसकी सुनी जानी चाहिए, किसी की जगह पर खड़ा किया गया देखभाल करने वाला नहीं। ऐसे परिवार वाले कार्यक्रम भी हैं जो ठीक इसी बात पर बने हैं, जो भाई-बहनों को सच्ची समझ देते हैं और बात कहने का पूरा हक़ भी।
जिस भाई या बहन ने चुपचाप पूरे घर को थामे रखा, उसे भी थामे जाने का हक़ है।
एक ईमानदार बात चुनिए जो आप इस हफ़्ते किसी माता या पिता से कह सकें, शांति से, लड़ाई की तरह नहीं। कुछ ऐसी, "मुझे देव का ADHD बेहतर समझना है, और मुझे यह भी चाहिए कि हम इस पर बात करें कि यह सब मेरे लिए कैसा रहा है।" उसे अपने फ़ोन में लिख लीजिए। इसे ज़ोर से कह देना, एक बार भी, वह वज़न आपके ऊपर से हटाकर वापस परिवार पर रख देता है, जहाँ वह है।
यह जानकारी कहाँ से है
और पढ़ने के लिए
यह गाइड समझने में मदद करती है। यह निदान नहीं है। उसके लिए डॉक्टर से मिलें।