Replaying the day दिन का रीप्ले। यह ट्रैक बिस्तर के लिए है, जब दिन बार-बार घूम रहा हो। वह जो आपने कहा, वह जो उन्होंने कहा, वह जो आपको करना चाहिए था। हर बार जब वह चलता है, आप उसे फिर देखते हैं, और नींद और दूर चली जाती है। लेटे रहिए। बत्ती बंद। आंखें बंद, या अंधेरे में खुली। फ़ोन को उल्टा रख दीजिए, या पहुंच से दूर। अपने नीचे बिस्तर को महसूस कीजिए। सिर के नीचे तकिया। टांगों और बाहों का वज़न। सांस को धीमा होने दीजिए। बड़ी सांस अंदर नहीं। बाहर, लंबी और चुपचाप। फिर से। अब, वह रीप्ले। उसे फिर से देखने की जगह, उसे नाम दीजिए। कुछ सीधे-सादे शब्द। वह मीटिंग। खाने पर जो मैंने कहा। वह मैसेज। सोचिए कि आप उसे बिस्तर के बाहर कहीं रख रहे हैं। दरवाज़े के पास की टेबल पर। किसी शेल्फ़ पर। किसी दराज़ में, दराज़ बंद करके। वह सुबह के लिए वहीं है। अगर रीप्ले फिर शुरू हो, और शायद होगा, तो वही बात। उसे नाम दीजिए। सोचिए कि वह वापस शेल्फ़ पर जा रहा है। फिर सांस पर वापस। सांस बाहर, लंबी और चुपचाप। रात का मन अच्छा जज नहीं होता। वह छोटी चीज़ों को बहुत बड़ा बना देता है, और ख़त्म हो चुकी चीज़ों को फिर खोल देता है। वह अभी आपको जो दिखा रहा है, वह साफ़ तस्वीर नहीं है। वापस शेल्फ़ पर। वापस सांस पर। महसूस कीजिए कि शरीर का वज़न बिस्तर में धंस रहा है। हर बाहर की सांस के साथ और भारी। अगर दिन का कोई नया टुकड़ा आए, तो वह भी शेल्फ़ पर जाता है। जगह है। आपको सो जाना ज़रूरी नहीं। यहां लेटे रहना, धीरे-धीरे सांस लेना, दिन को शेल्फ़ पर रखकर, यह भी आराम है। नींद आ सकती है, या नहीं भी। सांस बाहर। दिन शेल्फ़ पर है। बिस्तर आपको थामे हुए है। आज रात कुछ सुलझाना नहीं है। बाहर, धीमी और चुपचाप।