Restless बेचैनी। यह ट्रैक उन वक़्तों के लिए है, जब शरीर टिक कर बैठता ही नहीं। टांगें हिलना चाहती हैं, हाथों को कुछ करने को चाहिए, और शांत होने की हर कोशिश से बात और बिगड़ती है। तो हम बैठने से शुरू नहीं करते। हम हिलने-डुलने से शुरू करते हैं। खड़े हो जाइए। अपने लिए थोड़ी जगह बनाइए। हाथों को झटकिए, ढीले-ढाले, जैसे पानी झाड़ रहे हों। इसे बाहों तक ऊपर जाने दीजिए। बाहों को झटकिए। अब वज़न एक पैर से दूसरे पैर पर लाइए। चाहें तो थोड़ा उछलिए। टांगों को वह मिलने दीजिए, जो वे चाहती थीं। कमरे में चलिए। एक दीवार से दूसरी तक, और वापस। धीरे नहीं। जिस रफ़्तार से शरीर चाहे। और फिर से, इस बार थोड़ा धीरे। अब चलना रोकिए और खड़े रहिए। फ़र्श पर पैरों को महसूस कीजिए, और दिल को, जो थोड़ा तेज़ चल रहा है। यह ठीक है। शरीर को उसकी बारी मिल गई। एक लंबी सांस बाहर। अब बैठिए, अगर मन हो। शरीर अभी तैयार न हो, तो खड़े रहिए। दोनों ठीक हैं। सांस को धीमा होने दीजिए। बड़ी सांस अंदर नहीं। बाहर, लंबी और आराम से। फिर से। बेचैनी अब भी हो सकती है। हिलने-डुलने के बाद यह अक्सर थोड़ी कम होती है, पूरी ख़त्म नहीं। अगर फिर बढ़े, तो खड़े होकर कमरे में एक बार और चलिए। सांस बाहर। अगर आंखें बंद थीं, तो आंखें खोलिए। अपने दिन में आगे बढ़िए।