Three good things तीन अच्छी बातें। यह दिन के आख़िर के लिए एक छोटा सा अभ्यास है। आप पीछे मुड़कर देखते हैं और तीन ऐसी चीज़ें ढूंढते हैं, जो आज थोड़ी ठीक रहीं। वे बहुत छोटी हो सकती हैं। चाय का एक कप, जो गरम था। छोटा होना ही असल बात है। बैठिए या लेट जाइए। आंखें बंद, या सामने ज़मीन पर टिकी हुई। एक धीमी सांस बाहर। दिन को सुबह से अब तक, अपने सामने से गुज़रने दीजिए। ज़ोर लगाकर मत ढूंढिए। छोटी-छोटी चीज़ों को अपने आप ऊपर आने दीजिए। पहली चीज़। उसे मन ही मन, सीधे-सादे शब्दों में कहिए। बस वह क्या थी, यह नहीं कि वह क्यों मायने रखती थी। एक पल उसके साथ रहिए। आप कहां थे? वह कैसा लगा था? दूसरी चीज़। वह पहली से भी छोटी हो सकती है। उसके साथ रहिए। तीसरी चीज़। अगर कुछ न आए, तो कोई आम सी चीज़ चुन लीजिए। आपने खाना खाया। आप घर पहुंच गए। आप अभी आराम कर रहे हैं। ये भी गिनती में आती हैं। अब तीनों को एक साथ थामिए, जैसे हाथ में तीन छोटे पत्थर। मुश्किल दिन पर मन अक्सर वह रखता है, जो ग़लत हुआ, और वह छोड़ देता है, जो ठीक हुआ। यह अभ्यास उससे कहता है कि एक मिनट के लिए तीन चीज़ें रखे। मुश्किल हिस्से अब भी वहीं हैं। उन्हें पूरा दिन नहीं चाहिए। एक और धीमी सांस बाहर। जब आप तैयार हों, अगर आंखें बंद थीं, तो आंखें खोलिए। चाहें तो ये तीन चीज़ें घर में किसी को बताइए, या लिख लीजिए। फिर अपनी शाम आगे बढ़ाइए।