Worry on paper काग़ज़ पर फ़िक्र। इस ट्रैक के लिए कलम और काग़ज़ चाहिए। अगर बस फ़ोन का नोट्स ऐप है, तो वह भी चलेगा, पर काग़ज़ बेहतर है। उस पर और कुछ नहीं होता। फ़िक्रें सिर में गोल-गोल घूमती रहती हैं, क्योंकि उन्हें रखने की कोई जगह नहीं होती। यह उन्हें एक जगह देता है। काग़ज़ सामने रखकर बैठिए। एक धीमी सांस बाहर। अब लिखिए कि आपको किस बात की फ़िक्र है। हर एक के लिए एक लाइन। समझाइए मत, सुलझाइए मत। बस फ़िक्र का नाम। तब तक लिखते रहिए, जब तक लिस्ट ख़त्म न हो जाए। अगर और आएं, तो उन्हें भी जोड़ दीजिए। लिस्ट को देखिए। कलम नीचे रख दीजिए। ध्यान दीजिए कि उन्हें सिर के बजाय काग़ज़ पर देखना कैसा लगता है। राहत, या एक झटका। दोनों आम हैं। अब लिस्ट पर एक-एक करके जाइए। हर फ़िक्र के बगल में दो निशानों में से एक लगाइए। एक टिक, अगर उसके बारे में आप कुछ कर सकते हैं। एक गोला, अगर अभी कुछ करने को नहीं है, या वह आपके हाथ में नहीं है। गोले वाली फ़िक्रें वे हैं, जिन्हें अभी के लिए नीचे रखना है। हो सकता है वे अब भी मायने रखती हों। पर उनकी फ़िक्र करना, उनके बारे में कुछ करने जैसा नहीं है, और अभी करने को कुछ है नहीं। आप कल फिर देख सकते हैं। अब टिक वाली। एक चुनिए। सबसे बड़ी नहीं। वह, जिस पर आप सबसे जल्दी शुरू कर सकते हैं। उसके नीचे एक अगला कदम लिखिए। इतना छोटा कि आज या कल हो सके। एक फ़ोन कॉल, एक मैसेज, किसी से पूछने वाला एक सवाल। बस, यही पूरा अभ्यास है। एक लिस्ट, दो तरह के निशान, एक अगला कदम। काग़ज़ को मोड़कर रख लीजिए, या अगर बेहतर लगे तो फेंक दीजिए। अगर फ़िक्रें आज रात वापस आएं, तो आप खुद को याद दिला सकते हैं कि वे काग़ज़ पर हैं। एक और धीमी सांस बाहर छोड़िए। फिर जाकर वह अगला कदम उठाइए, या अपना दिन आगे बढ़ाइए।