The kind, steady voice प्यार भरी, ठहरी हुई आवाज़। हम में से ज़्यादातर लोगों के अंदर एक से ज़्यादा आवाज़ें होती हैं। एक आवाज़ है जो नुक्स निकालती है। वह कहती है कि आपको पहले से समझना चाहिए था, कि आप बहुत ज़्यादा हैं, या काफ़ी नहीं हैं। एक हिस्सा है जो उस आवाज़ के बोलने पर छोटा और चोट खाया हुआ महसूस करता है, वह हिस्सा जो वैसा ही महसूस करता है जैसा आप बचपन में करते थे, जब कुछ गलत हो जाता था। और एक और आवाज़ है, ज़्यादा धीमी, जिसे ज़्यादातर लोग दूसरों के साथ आसानी से इस्तेमाल करते हैं, और खुद के साथ कम ही। वह शांत, ठहरी हुई, प्यार भरी आवाज़। वह आवाज़ जो आप किसी मुश्किल में पड़े दोस्त के साथ, या किसी डरे हुए बच्चे के साथ इस्तेमाल करते हैं। यह अभ्यास उस आवाज़ को ढूंढने, और उसे अपनी तरफ़ मोड़ने के बारे में है। अगर किसी भी पल इससे आपके अंदर उससे ज़्यादा भावना उठे, जितनी आप अभी चाहते हैं, तो आंखें खोलिए, कमरे को देखिए, और सांस लीजिए। आप किसी और दिन इस पर वापस आ सकते हैं। कोई जल्दी नहीं है। आराम से बैठिए या लेटिए। आंखों को बंद होने दीजिए या नरम कर लीजिए। कुछ धीमी सांसें लीजिए। अब, हाल का कोई ऐसा पल याद कीजिए, जब आपने खुद को छोटा महसूस किया। ज़िंदगी का सबसे बुरा पल नहीं। कोई छोटा सा पल। कोई वक़्त जब आपको शर्म आई, या आप अलग-थलग पड़ गए, या डर लगा, या लगा कि आप काफ़ी अच्छे नहीं हैं। शायद किसी ने कुछ कहा। शायद आपसे कोई गलती हुई। शायद किसी ने आपको देखा ही नहीं। उस पल को तस्वीर की तरह देखिए। आप कहां थे? क्या हुआ था? अब अपने उस हिस्से पर ध्यान दीजिए, जो उस पल में दुखी था। छाती या पेट में वह अहसास। छुप जाने की, या रोने की, या चुप हो जाने की इच्छा। बहुत से लोग पाते हैं कि यह हिस्सा उनसे छोटी उम्र का लगता है। किसी बच्चे जैसा, या किसी टीनएजर जैसा। देखिए कि क्या आप उस छोटे वाले आप को देख सकते हैं, जिसे चोट लगी थी। उसकी उम्र कितनी लगती है? वह क्या कर रहा है? कहां बैठा है, या खड़ा है? एक पल के लिए उसे देखिए। बिना राय बनाए। बिना यह कहे कि अब भूल भी जाओ। अब, अपने दूसरे हिस्से को लाइए। बड़े वाले को। वह जो शांत, ठहरा हुआ और प्यार भरा है। आप इस हिस्से को जानते हैं। यह वही हिस्सा है जो रात के दो बजे किसी दोस्त की मदद करता है। वह हिस्सा जिसे पता है कि रोते हुए बच्चे से कैसे बात करनी है। वह हिस्सा जिसने आपको पहले भी मुश्किल वक़्त से निकाला है, तब भी, जब लगता था कि वह है ही नहीं। उस बड़े वाले हिस्से को उस सीन में आते हुए और छोटे वाले के बगल में बैठते हुए देखिए। इतना पास कि महसूस हो। बहुत पास नहीं। बड़ा वाला भाषण नहीं देता। यह नहीं कहता कि तुम ज़्यादा ही सोच रहे हो। यह नहीं कहता कि खुद को संभालो। बड़ा वाला बैठता है, छोटे वाले को देखता है, और देखता है कि वह क्या महसूस कर रहा है। छोटे वाले को इस वक़्त क्या सुनने की ज़रूरत है? शब्दों को आने दीजिए। वे अक्सर सादे होते हैं। कुछ ऐसा: मुझे दिख रहा है कि तुम्हें चोट लगी है। या: वह तुम्हारी गलती नहीं थी। या: तुम बहुत ज़्यादा नहीं हो। या: मैं यहां हूं, और तुम्हारे साथ हूं। बड़े वाले को यह कहने दीजिए। अपने मन में, अपने शब्दों में, एक प्यार भरी, ठहरी हुई आवाज़ में। ध्यान दीजिए कि छोटा वाला कैसे जवाब देता है। शायद वह थोड़ा ढीला पड़ जाए। शायद उसे अभी यकीन न हो। कोई बात नहीं। बड़े वाले में सब्र है। अगर मदद मिले, तो फिर से कहिए। अगर अब नुक्स निकालने वाली आवाज़ आ जाए और कहे कि यह सब बचकाना है, या कि आप इसके लायक नहीं हैं, तो उस पर ध्यान दीजिए। बड़ा वाला उसे सुन सकता है और नरमी से कह सकता है: अभी नहीं। फिर वापस छोटे वाले की तरफ़ मुड़िए। क्या छोटे वाले को कुछ चाहिए? कंधे पर एक हाथ। एक कंबल। कोई जो उसके और उस चीज़ के बीच खड़ा हो जाए, जिसने उसे चोट पहुंचाई। बड़े वाले को वह देने दीजिए। इस तस्वीर के साथ थोड़ी देर रुकिए। आप दोनों, साथ में। चोट खाया हिस्सा और ठहरा हुआ हिस्सा, एक ही जगह, एक ही वक़्त। अब बड़े वाले को छोटे वाले से कहने दीजिए कि वह फिर आ सकता है। कि यह सिर्फ़ एक बार की मुलाकात नहीं है। कि जब वह छोटा, चोट खाया हुआ अहसास फिर आए, तो आपके अंदर एक आवाज़ है, जिसे पता है कि उससे कैसे मिलना है। एक धीमी सांस लीजिए। तस्वीर को धीरे से धुंधला होने दीजिए। कुर्सी या बिस्तर पर अपने शरीर के वज़न पर ध्यान दीजिए। कमरे की आवाज़ों पर ध्यान दीजिए। आंखें खोलने से पहले, खुद से एक प्यार भरी बात कहिए, उसी ठहरी हुई आवाज़ में, इस बारे में कि आपने अभी कैसा किया। जब आप तैयार हों, आंखें खोलिए। अगर आप खतरे में हैं, या आपको लगता है कि आप खुद को सुरक्षित नहीं रख पा रहे, तो अपने Weave clinician को फ़ोन कीजिए, या Tele-MANAS को, एक चार चार एक छह पर, किसी भी वक़्त।