Surfing an urge तलब पर सवार होना। यह ट्रैक उस वक़्त के लिए है, जब कोई तलब उठती है। पीने की, नशा करने की, सिगरेट की, फ़ोन स्क्रॉल करने की, भूख मिट जाने के बाद भी खाते रहने की, वह मैसेज भेजने की, वह चीज़ खरीदने की, वह काम करने की, जो आपने खुद से कहा था कि आज नहीं करेंगे। आपकी तलब जो भी हो, यह अभ्यास सबके साथ एक जैसा चलता है। ऐसी जगह ढूंढिए जहां आप कुछ मिनट बैठ सकें, हो सके तो उस चीज़ से दूर। अगर बोतल, फ़ोन, या पैकेट आपकी पहुंच में है, तो उसे दूसरे कमरे में रख दीजिए, या खुद दूसरे कमरे में चले जाइए। यह इसलिए नहीं कि आप उसे रोक नहीं सकते। यह इसलिए कि दूरी से अगले कुछ मिनट आसान हो जाते हैं। बात यह है। तलब समंदर की लहर जैसी होती है। वह बनती है, उठती है, चोटी पर पहुंचती है, और फिर उतर जाती है। लोग अक्सर मानते हैं कि तलब तब तक चढ़ती रहेगी, जब तक वे उसके आगे झुक न जाएं। असल में, अगर आप कुछ न करें, तो वह उठती है, चोटी पर पहुंचती है, और अपने आप नीचे आ जाती है, आमतौर पर थोड़ी ही देर में। हर बार जब आप एक को गुज़र जाने देते हैं, अगली अक्सर थोड़ी छोटी और थोड़ी कम देर की होती है। यह अभ्यास लहर पर सवार रहने के बारे में है, उससे गिर जाने के बजाय। यहां आपको यह नहीं बताया जा रहा कि क्या करना है। तलब पर अमल करना है या नहीं, यह आपका फ़ैसला है, और आपका ही रहेगा। यह बस एक तरीका है, वह फ़ैसला साफ़ दिमाग़ से लेने का, लहर के अंदर से नहीं। तो, शुरू करते हैं। आराम से बैठिए। आंखें खुली या बंद। एक धीमी सांस बाहर छोड़िए। अब तलब से मुंह मोड़ने की जगह, उसकी तरफ़ मुड़िए। शरीर में आप उसे कहां महसूस करते हैं? बहुत से लोगों को वह छाती में, गले में, पेट में, हाथों में, या मुंह में मिलती है। वह जगह ढूंढिए जहां वह सबसे तेज़ है। उसे खुद को सीधे-सादे शब्दों में बताइए, जैसे आप मौसम का हाल बताते हैं। कसी हुई है या ढीली? गरम है या ठंडी? ठहरी हुई है या हिल रही है? उसका कोई किनारा है, या वह बाकी शरीर में घुल जाती है? सिर्फ़ जो है, वही। कोई राय नहीं। अब तलब की ताकत को नंबर दीजिए, शून्य से दस तक। शून्य मतलब कुछ नहीं। दस मतलब अब तक की सबसे तेज़। एक नंबर चुनिए और उसे याद रखिए। सांस लीजिए। नाक से अंदर, मुंह से धीरे-धीरे बाहर। बाहर की सांस को लंबी रहने दीजिए। तलब के साथ जो ख़याल आते हैं, उन पर ध्यान दीजिए। एक से क्या फ़र्क पड़ेगा। मुझे इसका हक़ है। कल से फिर शुरू कर लेंगे। सब करते हैं। ये ख़याल लहर का हिस्सा हैं। यह तलब ही है, जो शब्दों में बोल रही है। आप इन्हें ख़याल की तरह देख सकते हैं, न बहस करते हुए, न इनकी बात मानते हुए। आप मन में यह भी कह सकते हैं: लो, तलब फिर बोल रही है। वापस शरीर पर आइए। क्या अहसास अपनी जगह से हिला है? शक्ल बदली है? तेज़ हुआ है, या हल्का? फिर से नंबर दीजिए, शून्य से दस। लंबी बाहर की सांस के साथ सांस लेते रहिए। अहसास के साथ बने रहिए। आप उसे दबा नहीं रहे। आप उसे बढ़ावा नहीं दे रहे। आप उसे देख रहे हैं। तलब अक्सर दूसरी बार उठती है, कभी-कभी तीसरी बार भी। अगर वह फिर चढ़े, तो इसका मतलब यह नहीं कि अभ्यास नाकाम हो गया। इसका मतलब है कि आप लहर पर हैं। सांस लेते रहिए। देखते रहिए। एक बार और नंबर दीजिए, शून्य से दस। देखिए कि नंबर ज़रा भी बदला है या नहीं। एक पॉइंट भी नीचे आया, तो लहर मुड़ रही है। अगर नहीं बदला, तो थोड़ी देर और रुकिए। लहरों को जितना वक़्त लगना है, लगता है। अब, जब आप यहां हैं, थोड़े साफ़ दिमाग़ के साथ, तो आप खुद से एक सवाल पूछ सकते हैं। आज, रात होने तक, मुझे अपने लिए क्या चाहिए? हमेशा के लिए नहीं। सिर्फ़ आज। जवाब को ज़ोर लगाए बिना आने दीजिए। आगे आप जो भी करने का फ़ैसला करें, आपने पहले ही कुछ काम का कर लिया है। आप कई मिनट एक तलब के साथ बैठे रहे, उस पर तुरंत अमल किए बिना। यह एक हुनर है, और हर बार अभ्यास से यह और मज़बूत होता है। अगर मदद मिले, तो यह ट्रैक ख़त्म होने पर अपने हाथों या पैरों से कोई एक छोटा सा काम कीजिए। एक कप धो लीजिए। बाहर कदम रखिए। किसी को फ़ोन कीजिए। शरीर को अगले दस मिनट में ले जाइए। अगर आप खतरे में हैं, या आपको लगता है कि आप खुद को सुरक्षित नहीं रख पा रहे, तो अपने Weave clinician को फ़ोन कीजिए, या Tele-MANAS को, एक चार चार एक छह पर, किसी भी वक़्त।